वीणावादिनी की आराधना का दिवस

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवति देहि मे। धर्म देहि,धनं देहि सर्व विद्या प्रदेहि मे॥
  
   वसंत पंचमी का दिन अत्यंत पावन है क्योंकि शरद ऋतु सम कान्ति वाली, चन्द्र सम सौन्दर्य वाली, श्वेत हंस वाहिनी, स्फटिक माला धारिणी, वीणावादिनी, साहित्य, संगीत एवं कला की देवी की आराधना का दिवस भी वसंत पंचमी को ही मनाया जाता है। आज ही के दिन मां सरस्वती का जन्म हुआ था। सरस्वती के जन्म की कथा भी अत्यंत रोचक है। ब्रह्मा ने जब सृष्टिं की रचना का संकल्प किया तो चिंतन के क्षणों में उनके ललाट पर एक शुभ चिन्ह उदित हुआ और कुछ पलों के पश्चात्ं उस स्थान से एक बालिका का उद्ंभव हुआ। ब्रह्मंा ने पूछा ''तुम कौन हो'' ,उस बालिका ने उत्तर दिया ''मेरा जन्म आपके चिंतन से हुआ, आप मुझे सेवा का भार सौंपें'' ब्रह्मंा ने वरदान दिया, ''तुम लोगों की जिह्वा में स्थान ग्रहण करो और वाक शक्ति बनकर नाचती रहो''। इस जग में वाक ही सब कुछ है। वस्तुत: यदि वाक न हो तो जगत के प्रत्येक कार्य को करना एक समस्या बन जाए। जिनके प्राण जितने अधिक ऊर्जावान होते हैं उनकी वाणी उतनी ही प्रभावशाली होती है। वैदिक युग के विद्वानों ने वाणी के चार रूप बताए हैं। वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। ये वाणियां कंठ, ऊ‌र्ध्व प्रदेश, हृदय और नाभि से निसृत होती हैं। प्रतिदिन के बोलचाल की भाषा वैखरी वाणी है कुछ विचार कर बोली जाने वाली मध्यमा कहलाती है। हृदयस्थल से बोली गयी भाषा पश्यंती कहलाती है। पश्यंती गहन वाणी होती है। परा वाणी दैवीय होती है, जो आध्यात्मिक जगत में उच्च दैवीय चेतनाओं द्वारा बोली जाती है। उदाहरणार्थ गीता में दिया हुआ अर्जुन को ज्ञान। वस्तुत: वाणी की देवी सरस्वती पर जिनकी कृपा होती है वही पश्यंती और परा वाणियों की गहनता को जान सकता है।
  
   देवी भागवत एवं ब्रह्मं वैवर्त पुराण के अनुसार इस दिन श्रीकृष्ण ने प्रथम बार माँ सरस्वती की पूजा की थी। देवी सरस्वती की पूजा करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा ''देवी सरस्वती प्रत्येक ब्रह्माण्ड में माघ शुक्ल पंचमी के दिन विद्यारंभ के शुभ अवसर पर बड़े गौरव के साथ तुम्हारी विशाल पूजा होगी। आज से लेकर प्रत्येक प्रलय, प्रत्येक काल में मनुष्य एवं देवता गण तुम्हारा ध्यान पूजन करेंगे। और तुम्हारे कवच को भोज पत्र पर लिखकर उसे किसी धातु की डिब्बी में रखकर गंध एवं पूजन आदि से पूजित करके लोग दाहिनी भुजा में धारण करेंगे। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूजन के पश्चात्ं सभी देवी देवताओं ने मुनियों एवं सामान्य जनों ने देवी सरस्वती की पूजा की तभी से वसंतपंचमी का दिन मां सरस्वती की आराधना दिवस के रूप में मनाया जाता है। मां सरस्वती की ही कृपा से मनुष्य सद्ंविवेक, प्रतिभा एवं विभिन्न कलाओं में निष्णात होता है। इसीलिए वसंतपंचमी के दिन वाणी की देवी सरस्वती की पूजा एवं आराधना की जाती है।
  
   महाकवि दण्डी ने काव्यादर्श नामक ग्रन्थ में लिखा है ''सरस्वती का एकांत प्रसाद पाना सामान्य उपलब्धि नहीं। सरस्वती की अनुकम्पा चाहने वाले साधक को तंद्रा त्याग देनी चाहिए। निद्रा पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। विद्या जहां मिले वहां से ग्रहण करनी चाहिए। जीवन में मिले विघ्नों को विघ्न नहीं मानना चाहिए। रात्रि दिन परिश्रम करना चाहिए। अध्यवसाय द्वारा ऊ‌र्ध्वमुखी चिंतन में डूबना चाहिए। व्यर्थ के कार्यो में समय नष्ट नहीं करना चाहिए।'' वस्तुत: ऐसी अटूट साधना करने वाले पर ही सरस्वती प्रसन्न होती है और सर्वत्र ऐसे प्राणी की कीर्ति व्याप्त हो जाती है। शारदा तिलक एवं सरस्वती रहस्योपनिषद् में माँ की अगाध स्तुतियां है। वसंत पंचमी के पावन समय में जो भी माँ की पूजा, आराधना करता है एवं ॐ हृीं, ऐं हीं ॐ सरस्वत्यै नम: मंत्र का जप करता है, वह हंस वाहिनी, वीणा वादिनी की कृपा का भागी बनता है।
  
   हे! कुन्द के पुष्प एवं चन्द्र सम श्वेत कान्ति वाली, शरद ऋतु के कमल के समान मुख वाली, हाथों में वीणा और पुस्तक धारण करने वाली, हे श्वेत वस्त्रों से सुशोभित ब्रह्मंा, विष्णु एवं शिव द्वारा आराधित, सब प्रकार के अंधकार को दूर करने वाली मां, मोह एवं अंधकार से भरे मुझ अकिंचन पर अपनी दया करो।
  
   डॉ. प्रमिला