वसन्तपंचमी उत्सव

यह उत्सव ऋतुराज वसन्त के आरम्भ का है। वसन्तपंचमी वसन्तागमन की अभिनन्दन तिथि है। प्राचीन काल से इस महोत्सव को अपूर्व उत्साह से मनाया जाता रहा है। पंचमी को श्री पंचमी भी कहा गया है। इस दिन विद्या की अधिष्ठंात्री देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है।
 सरस्वती पांच प्रकृतियों में एक है।
   गणेशजननी दुर्गा राधा लक्ष्मी: सरस्वती। सावित्री च सृष्टिंविद्यौ पंच प्रकृतयस्ति्वमा:॥
  
   इस प्रकार सरस्वती देवी वागंधिष्ठांत्री के साथ सृष्टिं का कारण भी कही गयी है।
 
  श्रीमद्भागवत में वर्णित है- सरस्वती की आराधना फलदायक है-
 प्रचोदितायेन पुरा सरस्वती वितन्वताजस्य सतीं स्मृतिं हृदि।
 स्वलक्षणा प्रादुरभूत् किलासस्यत: स मे ऋषीणामृषभ: प्रसीदताम॥

  जिन्होंने सृष्टि के समय ब्रह्मा के हृदय में पूर्वकल्प की स्मृति जागृत करने के लिए ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी को प्रेरित किया और वे अपने अंगों के सहित वेद के रूप में उनके मुख से प्रकट हुई, वे ज्ञान के मूल कारण भगवान मुझ पर कृपा करें, मेरे हृदय में प्रकट हों।
 
  पूजाविधि:-
  वसन्त पंचमी को प्रात: नित्यक्रिया से निवृत्त होकर शुद्ध आसन पर विराजमान हो निमन् संकल्प करें।
  ॐ अद्य अमुकगोत्रोऽअमुकनामाहं सरस्वतीदेविप्रीति द्वारा
   सद्ंबुद्धि सद्ंविद्याविवेकप्राप्त्यर्थ गणपत्यादि देवानां पूजनपूर्वकं महासरस्वती पूजनं करिष्ये।
   संकल्प करके श्री गणेश पूजन, कलशपूजन, षोडश मातृका पूजन, विधि के अनुसार रक्षा बंधन करें। दोनों हाथ में चावल और पुष्प लेकर पुस्तक पर या घट के ऊपर मूर्ति स्थापित कर सरस्वती देवी का ध्यान निम्न मंत्र से करें।
   कोटिचन्दप्रभामुष्ट पुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्ं। वह्निशुद्धांशुकाधानां वीणापुस्तकधारिणीम्ं॥
   रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्ं।
   सुपूजितां सुरगणैर्ब्रह्माविष्णुशिवादिभि:।
   वन्दे भक्तया वन्दिता†च मुनीन्द्रमनुमानवै:॥
   ध्यान करने के पश्चात्ं ''ॐ ह्रीं सरस्वत्यै नम:'' नाम मंत्र से षोडशोपचार पूजन, विधान से करें। सरस्वती को प्रसाद भोग लगावें।
   मक्खन, दही, दूध, सफेद तिल के लड्ंडू, धान का लावा, ईख, ईख का रस, गुड़, मधु, शक्कर,श्वेत चावल का कण, भात, खीर, जौ एवं गेहूं के चूर्ण की घी मिली पीठी, मिठाई, नारियल, नारियल का जल, कशेरू, मूली, अदरक, पका हुआ केला, श्रीफल, बेर-इनके अतिरिक्त देशकाल के अनुसार जो मिल जाय, उसी को भोग लगावें।
 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला| या शुभ्रवस्तावृता|
या वीणावरदंडमंडितकरा| या श्वेतपद्मासना||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभितिभिर्देवैःसदावंदिता|
सामांपातु सरस्वतीभगवती निःशेषजाड्यापहा||

   स्तुति कह कर प्रणाम करें।