नक्सलवाद पर नई नीति

प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा नक्सली उग्रवाद से निपटने की कमान अपने हाथों में लेने की पहल यह इंगित करने के लिए पर्याप्त है कि आखिरकार उसने आंतरिक सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न हो चुके खतरे की गंभीरता को महसूस किया। अच्छा होता कि उसे नक्सलवाद के खतरनाक उभार और उसे दबाने में केंद्रीय गृहमंत्रालय की असफलता का आभास पहले ही हो गया होता। आज यदि नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना गया है तो इसके लिए एक हद तक केंद्रीय सत्ता भी जिम्मेदार है। यह चिंताजनक है कि नक्सलवाद का सामना करने के मामले में केंद्र और राज्य अभी भी एकजुट नहीं हैं। यह तब है जब नक्सली समस्या के समाधान के लिए केंद्र और राज्यों की न जाने कितनी बैठकें हो चुकी हैं। देखना यह है कि नासूर बनते नक्सलवाद पर लगाम लगाने के मामले में प्रधानमंत्री की ताजा पहल प्रभावी सिद्ध होती है या नहीं? यह ठीक है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर पर इसकी जरूरत समझी गई कि नक्सल प्रभावित पिछड़े इलाकों में विकास कार्यो को भी गति देने की जरूरत है, लेकिन यह ध्यान रहे कि अब नक्सली संगठन विकास योजनाओं को ठप करने पर भी आमादा हैं। देश के कई हिस्सों में वे ऐसा करने सफल और सक्षम भी हैं। यही कारण है कि वे सरकारी तंत्र से भी उगाही कर रहे हैं। यह भी एक यथार्थ है कि नक्सलवाद से ग्रस्त इलाकों में विकास योजनाओं के मद में जाने वाला धन नक्सली संगठनों की जेबों में पहुंच रहा है। नक्सली संगठनों ने अन्य आपराधिक तत्वों के साथ-साथ भ्रष्ट नेताओं एवं नौकरशाहों से भी साठगांठ कायम कर ली है। इसी तरह वे विचाराधारा के स्तर पर भी ताकतवर हुए हैं। अब यह रहस्य नहीं है कि इस देश में अनेक लोग किंतु-परंतु के साथ नक्सली हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं।
   यदि प्रधानमंत्री कार्यालय का उद्देश्य संभावित मध्यावधि चुनाव के मद्देनजर महज नक्सली ंिहसा संबंधी आंकड़े दुरुस्त करना है तो फिर कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। अगर अभी भी नक्सली संगठनों पर लगाम लगाने का दिखावा किया गया अथवा उनसे नरमी बरती गई तो स्थितियां और अधिक बिगड़ना तय है, क्योंकि नक्सली दिन-प्रतिदिन मजबूत होते जा रहे हैं। वे इतने अधिक आधुनिक हथियारों से लैस हो गए हैं कि उनके समक्ष कई राज्यों की पुलिस होमगार्ड जैसी नजर आती है। मौजूदा समय नक्सलवाद से निपटना न केवल राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए, बल्कि उसके खिलाफ एक व्यापक और प्रभावशाली अभियान भी छेड़े जाने की जरूरत है। इसलिए और भी, क्योंकि पड़ोसी देश नेपाल में माओवादी पुराने रास्ते पर लौटते दिख रहे हैं। नेपाल सरकार से अलग होने के बाद माओवादी छल-बल से अपना वर्चस्व स्थापित करने की जैसी चेष्टा कर रहे हैं उससे वहां हालात खराब होने लगे हैं। भले ही भारत ने नेपाल की हाल की गतिविधियों को इस देश का आंतरिक मामला बताया हो, लेकिन तथ्य यह है कि उसे सीमावर्ती राज्यों में रेड अलर्ट का सुझाव देना पड़ा। अभी माओवादियों ने हथियार उठाए नहीं हैं, लेकिन वहां से लोगों का पलायन शुरू हो गया है। यदि नेपाल में माओवादी मनमानी पर उतर आए तो उससे भारत में नक्सली संगठनों को बल मिलना स्वाभाविक है।
  
   [जागरण - मुख्य संपादकीय]